8 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित पार्क सॉन-योंग के कॉलम में किशोरों के स्मार्टफोन इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के संबंध पर विचार किया गया और कहा गया कि केवल परिवारों के प्रयासों से इससे निपटना कठिन है; इसमें राष्ट्रीय स्तर पर पाबंदी और नीतिगत चर्चा की मांग की गई। कॉलम में फ्रांस के स्कूलों के भोजन में शराब पर चरणबद्ध पाबंदी के उदाहरण को स्मार्टफोन से तुलना के रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया गया। साथ ही, इसमें किशोरों की आत्महत्या दर और खुद को नुकसान पहुंचाने तथा आत्महत्या के प्रयासों, अवसाद और चिंता विकारों की वृद्धि दरें दी गईं, लेकिन उन आंकड़ों का स्रोत या उनकी गणना का आधार लेख में नहीं बताया गया।

कॉलम में दी गई वृद्धि दरें एक अहम मुद्दा उठाती हैं, लेकिन वे अपने आप में यह साबित नहीं करतीं कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं स्मार्टफोन के इस्तेमाल के कारण हुईं।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

कॉलम में लिखा गया कि फ्रांस में 1956 तक प्राथमिक स्कूलों के भोजन में रेड वाइन दी जाती थी। इसमें आगे बताया गया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पियरे मेंदेस फ़्रांस ने 1956 में 14 साल से कम उम्र के छात्रों के स्कूल के भोजन में शराब पर पाबंदी लगा दी थी, और 14 से 18 साल के छात्रों को शराब-रहित भोजन केवल 1981 में, राष्ट्रपति फ़्रांस्वा मित्तराँ के पदभार संभालने के तुरंत बाद, मिलने लगा। इस उदाहरण का इस्तेमाल कॉलम की इस दलील को रूपक के तौर पर समर्थन देने के लिए किया गया कि जिन प्रथाओं को कभी स्वाभाविक या लाभकारी माना जाता था, समय के साथ बच्चों और किशोरों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उनका अलग मूल्यांकन किया जा सकता है।

कॉलम में बताया गया कि स्मार्टफोन दक्षिण कोरिया में 2009 में लॉन्च हुआ था और उस समय जिन बच्चों का पहला जन्मदिन मनाया गया था, वे अब हाई स्कूल के अंतिम वर्ष में हैं। समय के इस बीतने के जरिए यह रेखांकित किया गया कि स्मार्टफोन किशोरों के बड़े होने की प्रक्रिया में गहराई से शामिल हो चुका है। हालांकि, फ्रांस के स्कूलों में शराब परोसने और आज के स्मार्टफोन इस्तेमाल की समस्याएं अलग-अलग हैं; इसलिए यह ऐतिहासिक रूपक वैज्ञानिक तौर पर स्मार्टफोन के मानसिक स्वास्थ्य पर असर को साबित नहीं करता।

कॉलम में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 10 साल में किशोरों की आत्महत्या दर 104.7% बढ़ी और खुद को नुकसान पहुंचाने तथा आत्महत्या के प्रयासों में 553.1% की तेज वृद्धि हुई। इसमें यह भी लिखा गया कि अवसाद के मरीजों की संख्या 5 साल में 55.6% और चिंता विकारों की संख्या 42.2% बढ़ी। हालांकि, कॉलम से यह पता नहीं चलता कि इन चारों आंकड़ों में से प्रत्येक किस स्रोत पर आधारित है, किन वर्षों और किस आयु-सीमा की तुलना की गई है। खुद को नुकसान पहुंचाने तथा आत्महत्या के प्रयासों और चिंता विकारों की वृद्धि के लिए अवधि भी स्पष्ट नहीं की गई।

इस खबर का अर्थ

कॉलम की दलील को इस निष्कर्ष के रूप में देखने के बजाय कि स्मार्टफोन किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण साबित हो चुका है, गंभीर समस्या से निपटने की जिम्मेदारी अकेले परिवारों पर न छोड़कर सार्वजनिक स्तर पर कदम उठाने पर चर्चा करने की मांग के रूप में समझा जा सकता है। पार्क सॉन-योंग ने स्मार्टफोन और मानसिक स्वास्थ्य के बीच कारणात्मक संबंध स्पष्ट रूप से साबित न होने की आपत्ति का उल्लेख किया, फिर भी उनका कहना था कि परिवारों के स्तर पर पाबंदी लगाने की कोशिशें नाकाम रही हैं और कानून तथा नीतियों के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई जरूरी है। यह कॉलम का विचार है; मूल लेख में पाबंदी के ठोस उपाय या उनके असर का विवरण नहीं दिया गया।

इससे प्रभावित पक्ष केवल किशोर और उनके परिवार ही नहीं, बल्कि स्कूल और नीतियां बनाने वाली संस्थाएं भी हो सकती हैं। यदि पाबंदियों पर चर्चा होती है, तो किशोरों के स्मार्टफोन इस्तेमाल को सीमित करने के साथ-साथ यह भी विचार करना होगा कि पाबंदी के बाद संवाद, भागीदारी और खेल-कूद की उनकी जरूरतें कैसे पूरी होंगी। दरअसल, कॉलम इस बात पर जोर देता है कि स्मार्टफोन को हटाने से बनी जगह को किस चीज से भरा जाए, इस पर चर्चा जरूरी है। इसलिए मुद्दे में केवल यह तय करना शामिल नहीं है कि पाबंदी लगाई जाए या नहीं, बल्कि यह भी शामिल हो सकता है कि किस पर कौन-सा मानदंड लागू होगा और नतीजों की पुष्टि कैसे की जाएगी।

उदाहरण के लिए, यदि कोई स्कूल या नीतिगत प्राधिकरण किसी खास माहौल में स्मार्टफोन का इस्तेमाल घटाने के उपाय पर विचार करे, तो वह यह भी देख सकता है कि उस कदम का किशोरों के संवाद और भागीदारी पर क्या असर पड़ता है और मानसिक स्वास्थ्य के संकेतकों में क्या बदलाव आते हैं। यह केवल विचार किए जा सकने वाले तरीके का उदाहरण है; इसका मतलब यह नहीं कि कॉलम में किसी ठोस पायलट परियोजना या मूल्यांकन योजना का उल्लेख किया गया है। कॉलम में लिखा गया कि कई देशों ने पहले ही पाबंदियां लागू करनी शुरू कर दी हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किन देशों ने कौन-सी पाबंदी लागू की।

सत्यापित तथ्य और अब भी अनजानी बातें

सत्यापित तथ्य

  • पार्क सॉन-योंग का कॉलम 8 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित हुआ था।
  • कॉलम में बताया गया कि फ्रांस ने 1956 में 14 साल से कम उम्र के छात्रों के स्कूल के भोजन में शराब पर पाबंदी लगा दी थी और 14 से 18 साल के छात्रों को शराब-रहित भोजन केवल 1981 में मिलने लगा।
  • कॉलम में किशोरों की आत्महत्या दर में 10 साल में 104.7% की वृद्धि, खुद को नुकसान पहुंचाने तथा आत्महत्या के प्रयासों में 553.1% की वृद्धि, अवसाद के मरीजों की संख्या में 5 साल में 55.6% की वृद्धि और चिंता विकारों में 42.2% की वृद्धि के आंकड़े दिए गए।
  • पार्क सॉन-योंग ने इस आपत्ति का उल्लेख किया कि स्मार्टफोन और किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच कारणात्मक संबंध स्पष्ट रूप से साबित नहीं हुआ है, और राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की दलील दी।

अब भी अनजानी बातें

  • मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रस्तुत आंकड़ों के स्रोत और गणना का आधार क्या है, और तुलना किन वर्षों तथा आयु-समूहों के बीच की गई है?
  • खुद को नुकसान पहुंचाने तथा आत्महत्या के प्रयासों और चिंता विकारों की वृद्धि दर किन अवधियों की तुलना करती है?
  • किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर स्मार्टफोन इस्तेमाल के कारणात्मक असर का समर्थन करने वाले ठोस शोध-साक्ष्य क्या हैं?
  • कॉलम में जिन देशों द्वारा पाबंदियां लागू करने का उल्लेख है, वे कौन-से हैं और पाबंदियों का वास्तविक स्वरूप क्या है?
  • यदि राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई चुनी जाती है, तो पाबंदी किन लोगों पर और किस दायरे में लागू होगी, और किशोरों के संवाद, भागीदारी तथा खेल-कूद की जरूरतों को पूरा करने के लिए क्या उपाय होंगे?

पाठकों को किन बातों की जांच करनी चाहिए

  • आंकड़ों को देखते समय उनका स्रोत, तुलना के वर्ष, आयु-सीमा और वृद्धि दर का हर (denominator) क्या है, यह जांचना जरूरी है। अलग-अलग आधारों वाले आंकड़ों को एक साथ रखने से बदलाव के अर्थ को गलत समझा जा सकता है।
  • स्मार्टफोन के इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जुड़े दावों में एक ही समय पर हुई बढ़ोतरी और कारणात्मक संबंध के बीच फर्क करना चाहिए। कॉलम में भी इस आपत्ति का उल्लेख है कि कारणात्मक संबंध स्पष्ट रूप से साबित नहीं हुआ है।
  • यदि पाबंदी पर चर्चा ठोस रूप लेती है, तो पाबंदी के दायरे और तरीके के साथ यह भी देखना जरूरी होगा कि उसके बाद किशोरों के संवाद, भागीदारी और खेल-कूद को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा और नीतिगत असर की पुष्टि कैसे होगी।