अभियोजकों की पूरक जाँच की शक्ति समाप्त होने और अभियोजन कार्यालय (검찰청) बंद होने के बाद व्यवस्था बदल गई है: जाँच की जिम्मेदारी गंभीर अपराध जाँच एजेंसी (중대범죄수사청) और अभियोजन की जिम्मेदारी अभियोजन कार्यालय (공소청) को सौंपी गई है। हालांकि, बाल शोषण, घरेलू हिंसा, यौन अपराध, पीछा करना, दिव्यांग लोगों के साथ दुर्व्यवहार और बुज़ुर्गों के साथ दुर्व्यवहार जैसे सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के खिलाफ अपराधों को अनिवार्य रूप से अभियोजन के लिए भेजने का प्रावधान संशोधित दंड प्रक्रिया संहिता (형사소송법) के अंतिम मसौदे से हटा दिया गया। कोरियाई दिव्यांगजन मानवाधिकार मंच (한국장애인인권포럼) के दिव्यांगजन नीति निगरानी केंद्र (장애인정책모니터링센터) के वरिष्ठ शोधकर्ता जो ताएहेंग (조태흥) इस बदलाव के बीच इस बात को महत्वपूर्ण बताते हैं कि क्या दिव्यांग लोगों के न्याय तक पहुँचने का अधिकार संस्थागत रूप से सुनिश्चित है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

लेख के अनुसार, नेशनल असेंबली ने 31 जुलाई 2026 को अभियोजकों की पूरक जाँच की शक्ति पूरी तरह समाप्त कर दी। इसके बाद, 78 वर्षों के बाद 2 अक्टूबर को अभियोजन कार्यालय बंद हो गया और जाँच तथा अभियोजन की जिम्मेदारी क्रमशः गंभीर अपराध जाँच एजेंसी और अभियोजन कार्यालय को सौंप दी गई। जाँच और अभियोजन को अलग करने वाले सुधार की व्यापक रूपरेखा तैयार हो गई है, लेकिन जाँच की प्रक्रिया में अपराध पीड़ितों और संदिग्धों को किस तरह की सहायता मिलेगी, यह अलग से विचार किए जाने वाला प्रश्न बना हुआ है।

जो ताएहेंग बताते हैं कि सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के खिलाफ अपराधों को अभियोजन के लिए अनिवार्य रूप से भेजने का प्रावधान अंतिम मसौदे से हटा दिया गया और केवल यह वादा बचा कि इस विषय को अलग-अलग कानूनों के जरिए संबोधित किया जाएगा। अनिवार्य रूप से भेजने का मतलब है कि पुलिस द्वारा जाँचे गए मामले अभियोजन पक्ष को सौंपे जाएँ। यह प्रावधान हट जाने के बाद, इन अपराधों की किस प्रक्रिया से समीक्षा होगी और वे आगे के चरण तक कैसे पहुँचेंगे, यह संबंधित कानूनों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन की पड़ताल के बाद ही स्पष्ट होगा।

लेख में बताया गया है कि संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (유엔 장애인권리협약) का अनुच्छेद 13 न्याय तक पहुँच को एक स्वतंत्र अधिकार के रूप में परिभाषित करता है और राज्यों पर प्रक्रिया संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी डालता है। इसमें कहा गया है कि दिव्यांगजन भेदभाव-निषेध कानून (장애인차별금지법) का अनुच्छेद 26 और विकासात्मक दिव्यांगजन कानून (발달장애인법) भी जाँच और सुनवाई की प्रक्रिया में सुविधाएँ उपलब्ध कराने तथा बयान देने में सहायता का प्रावधान करते हैं। जो ताएहेंग का सवाल यह है कि क्या संस्थागत बदलाव के बाद भी ये अधिकार वास्तविक जाँच प्रक्रिया में प्रभावी रहने के लिए बनाए गए हैं।

अतीत में पूरक जाँच की शक्ति ने हमेशा पीड़ितों की रक्षा भी नहीं की। जो ताएहेंग ने लिखा कि नमक के खेतों में गुलामी के मामले में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी वारंट की माँग किए जाने पर अभियोजन पक्ष ने उसे लौटा दिया और पूरक जाँच को एक वर्ष से अधिक समय तक खींचा; इस दौरान पीड़ित को और अधिक शोषण का सामना करना पड़ा। उनका तर्क है कि कमजोर लोगों की रक्षा का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि यह शक्ति रखी जाए या समाप्त की जाए; किसी भी संस्था को जिम्मेदारी मिले, नुकसान को दूर करने की प्रक्रिया आवश्यक है।

इस खबर का अर्थ

जो ताएहेंग के विश्लेषण के अनुसार, पूरक जाँच की शक्ति समाप्त होने के बाद पुलिस की जाँच मामले की दिशा तय करने वाला अहम चरण बन गई है। उन्हें चिंता है कि खासकर वे दिव्यांग लोग जिन्हें जाँच के शुरुआती चरण में अपनी बात ठीक से व्यक्त करने में कठिनाई होती है, यदि उन्हें बयान देने में सहायता या संवाद संबंधी मदद नहीं मिलती, तो उनके बचाव के अधिकार कमजोर हो सकते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि जाँच प्रक्रिया तक पहुँच और उसमें सहायता दिव्यांग पीड़ितों के साथ-साथ दिव्यांग संदिग्धों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

सरकार ने खराब जाँच और मामलों को दबाने से रोकने के लिए अभियोजन के लिए न भेजे गए मामलों की विशेष रूप से समीक्षा करने वाला विभाग, अभियोजन के लिए न भेजे गए मामलों की समीक्षा विभाग (불송치심사부), अभियोजन कार्यालय में बनाया। लेकिन जो ताएहेंग का कहना है कि यह स्पष्ट नहीं है कि दिव्यांगता संबंधी विशेषताओं को ध्यान में रखकर सहायता, संवाद संबंधी मदद और उपचार की प्रक्रियाओं को बुनियादी प्रक्रिया के रूप में तैयार किया गया है या नहीं। समीक्षा विभाग बनाना और यह सुनिश्चित करना कि दिव्यांग लोग वास्तव में उस प्रक्रिया का उपयोग कर सकें—दो अलग-अलग चुनौतियाँ हो सकती हैं।

मिसाल के तौर पर, यदि दिव्यांगता वाला कोई व्यक्ति अपराध की शिकायत करता है, लेकिन जाँच के दौरान अपने अनुभव या इच्छा को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं कर पाता, तो शुरुआती मामले के रिकॉर्ड और बाद की समीक्षा प्रक्रिया में सहायता तथा संवाद संबंधी मदद उपलब्ध कराई जाती है या नहीं—इससे मामले के निपटारे पर असर पड़ सकता है। यह एक काल्पनिक स्थिति है और इससे किसी वास्तविक मामले के नतीजे के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा रहा। मुख्य बात यह है कि क्या व्यवस्था में ऐसी सहायता मौजूद है जिससे संबंधित व्यक्ति प्रक्रिया को समझ सके और उसमें भाग ले सके, और क्या जाँच अधूरी रहने पर उसे चुनौती देने के लिए उपचार की प्रक्रिया उपलब्ध है।

जो ताएहेंग का उठाया हुआ मुद्दा केवल पूरक जाँच की शक्ति को बनाए रखने या समाप्त करने तक सीमित नहीं है। उनका तर्क है कि सुधार कितना पूरा है, इसे इस बात से आँका जाना चाहिए कि क्या जाँच और सुनवाई की बुनियादी प्रक्रियाओं में दिव्यांग लोगों के न्याय तक पहुँचने का अधिकार सुनिश्चित है।

संबंधित व्यवस्था और सहायता की जानकारी

लेख में संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय के अनुच्छेद 13, दिव्यांगजन भेदभाव-निषेध कानून के अनुच्छेद 26 और विकासात्मक दिव्यांगजन कानून को जाँच और सुनवाई के दौरान प्रक्रिया संबंधी सुविधाओं तथा बयान देने में सहायता का आधार बताया गया है। जो ताएहेंग का प्रस्ताव है कि दिव्यांगता संबंधी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए बचाव के अधिकार की गारंटी, बयान देने में सहायता और अधिकारों की गारंटी विफल होने पर स्थिति को सुधारने के उपायों को कार्यान्वयन नियमों या आंतरिक दिशा-निर्देशों के बजाय कानून में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए। उनका यह भी कहना है कि विशेष विभाग के कर्मचारियों, बजट और निपटारे की समय-सीमा के लिए कानूनी आधार और जवाबदेही तय की जाए तथा दिव्यांग लोगों से परामर्श किया जाए।

आंतरिक कानूनी मार्गदर्शिका बताती है कि आपराधिक सुनवाई में सबूत किस तरह जुटाए और दर्ज किए गए तथा अदालत में बयान और उसकी सामग्री को चुनौती देने का अवसर मिला या नहीं—इन बातों का असर सबूत की ग्राह्यता (यानी मुकदमे में सबूत के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की पात्रता) पर पड़ता है। अवैध तरीके से जुटाए गए सबूत और उनके आधार पर मिले द्वितीयक सबूतों को सिद्धांततः दोषसिद्धि के सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, लेकिन विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर अपवाद लागू होता है या नहीं, यह तय किया जा सकता है। यह भी बताया गया है कि पुलिस द्वारा तैयार संदिग्ध से पूछताछ के बयान को सबूत के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रतिवादी या उसके वकील को अदालत में उसकी सामग्री स्वीकार करनी होगी।

पीड़ितों के लिए आपराधिक प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जा सकने वाले अलग-अलग अधिकार और व्यवस्थाएँ भी हैं। आंतरिक सामग्री के अनुसार, कुछ अपराधों के पीड़ित प्रथम या द्वितीय चरण की सुनवाई में बहस समाप्त होने से पहले मुआवज़े का आदेश माँग सकते हैं; और शर्तें पूरी होने पर गवाह से पूछताछ के दौरान किसी भरोसेमंद व्यक्ति को साथ रखने या बंद कमरे में सुनवाई का अनुरोध कर सकते हैं। जीवन या शरीर को नुकसान पहुँचाने वाले अपराध से कानून में निर्दिष्ट विकलांगता या गंभीर चोट होने पर, पात्रता की शर्तें पूरी करने वाले लोग अपराध पीड़ित सहायता राशि के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालांकि, यह नहीं माना जा सकता कि ये व्यवस्थाएँ जाँच के शुरुआती चरण में दिव्यांग लोगों को सहायता देने या अभियोजन के लिए न भेजे गए मामलों की समीक्षा विभाग द्वारा सहायता देने के तरीके का विकल्प हैं।

पुष्ट तथ्य और जो अभी स्पष्ट नहीं है

पुष्ट तथ्य

  • लेख के अनुसार, अभियोजकों की पूरक जाँच की शक्ति 31 जुलाई 2026 को पूरी तरह समाप्त कर दी गई; जाँच की जिम्मेदारी गंभीर अपराध जाँच एजेंसी और अभियोजन की जिम्मेदारी अभियोजन कार्यालय को सौंपी गई है।
  • सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के खिलाफ अपराधों को अभियोजन के लिए अनिवार्य रूप से भेजने का प्रावधान संशोधित दंड प्रक्रिया संहिता के अंतिम मसौदे से हटा दिया गया।
  • सरकार ने अभियोजन के लिए न भेजे गए मामलों की विशेष रूप से समीक्षा करने वाला विभाग अभियोजन कार्यालय में बनाया।
  • जो ताएहेंग ने दिव्यांगता संबंधी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए बचाव के अधिकार, बयान देने में सहायता और उपचार की प्रक्रियाओं को कानून में स्पष्ट रूप से दर्ज करने तथा विशेष विभाग के कर्मचारियों, बजट और निपटारे की समय-सीमा के लिए आधार तैयार करने का प्रस्ताव दिया।

जो अभी स्पष्ट नहीं है

  • दिए गए आधारों से यह पुष्टि नहीं होती कि सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के खिलाफ अपराधों को अभियोजन के लिए अनिवार्य रूप से भेजने से संबंधित अलग कानून का मसौदा वास्तव में पेश किया गया है या पारित हुआ है।
  • यह भी पुष्टि नहीं होती कि अभियोजन के लिए न भेजे गए मामलों की समीक्षा विभाग की ठोस समीक्षा प्रक्रिया और दिव्यांग लोगों को सहायता तथा संवाद संबंधी मदद देने के तरीके किस तरह तय किए जाएँगे।
  • यह अभी स्पष्ट नहीं है कि दिव्यांग लोगों से किस तरीके से परामर्श किया जाएगा और प्रस्तावित विशेष विभाग के कर्मचारियों, बजट तथा निपटारे की समय-सीमा को कानून में शामिल किया जाएगा या नहीं।

पाठकों को किन बातों की जाँच करनी चाहिए

  • दिव्यांग पीड़ितों या संदिग्धों को यह जाँचना चाहिए कि क्या जाँच और सुनवाई के दौरान आवश्यक संवाद संबंधी मदद और बयान देने में सहायता माँगने की प्रक्रिया वास्तव में उपलब्ध है। लेख में संबंधित कानूनों के अधिकार संबंधी प्रावधान बताए गए हैं, लेकिन आवेदन करने के ठोस तरीके पर चर्चा नहीं की गई है।
  • यदि मामले के रिकॉर्ड या बयान के लिखित विवरण पर सवाल हो, तो यह जाँचा जा सकता है कि विवरण किस तरह तैयार किया गया और क्या अदालत में उसकी सामग्री को चुनौती देने का अवसर है। सबूत की ग्राह्यता, उसे जुटाने की प्रक्रिया और अदालत में उसकी पुष्टि हुई या नहीं, इन बातों के आधार पर बदल सकती है; किसी सबूत को स्वीकार किया जाना और केवल उसी सबूत के आधार पर दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं।
  • आपराधिक सुनवाई चल रही हो तो पीड़ित मामले और पात्रता की शर्तों के अनुसार मुआवज़े के आदेश के लिए आवेदन की समय-सीमा और गवाह के रूप में पीड़ित की सुरक्षा की प्रक्रियाओं की जाँच कर सकते हैं। मुआवज़े के आदेश के लिए प्रथम या द्वितीय चरण की सुनवाई में बहस समाप्त होने से पहले आवेदन करना होता है; किसी भरोसेमंद व्यक्ति को साथ रखने या बंद कमरे में सुनवाई जैसे अनुरोध संबंधित पात्रता शर्तों के अधीन होते हैं।

संदर्भ