2 अक्टूबर को आपराधिक न्याय व्यवस्था बदल गई और गंभीर अपराध जांच एजेंसी तथा पुलिस ने मामलों की जांच की जिम्मेदारी संभालनी शुरू की। लेकिन पहले ही दिन विशेष जांच दल में भेजे गए अभियोजकों की संबद्धता के सवाल पर मुकदमे की कार्यवाही रोक दी गई। यह भी खबर आई कि गंभीर अपराध जांच एजेंसी ने शिकायतकर्ताओं और अभियोग दर्ज कराने वालों को औपचारिक पावती देने के बजाय केवल ‘प्राप्त’ की मुहर लगाई। पीड़ितों की सहायता के क्षेत्र की कठिनाइयों पर भी गौर करें, तो स्पष्ट होता है कि व्यवस्था में सुधार केवल नए संस्थानों और घोषणाओं से काम नहीं करता; इसके लिए मामलों के पंजीकरण, रिकॉर्ड संभालने और पीड़ितों की सहायता के ठोस व्यावहारिक काम का साथ होना जरूरी है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
방준호 के कॉलम में 박찬희 पत्रकार द्वारा पीड़ितों के लिए नियुक्त पुलिस अधिकारियों के काम पर की गई रिपोर्ट का परिचय दिया गया और बताया गया कि देशभर में ऐसे 256 अधिकारी हैं। पुलिस ने 12 फरवरी 2015 को राष्ट्रीय पुलिस एजेंसी के मुख्य सभागार में ‘पीड़ितों के लिए नियुक्त पुलिस अधिकारियों का स्थापना समारोह (피해자 전담 경찰관 발대식)’ आयोजित किया था। उस समय उनके काम का दायरा तीन चरणों में बताया गया था: ‘सहानुभूति→सहायता→स्थिरता’।
लेकिन कॉलम में जिन पुलिस अधिकारियों के काम का जिक्र है, वह उस घोषणा जितना सुचारु नहीं दिखता। वे सहायता के लिए बजट या कंपनियों से प्रायोजन ढूँढ़ते रहे, कभी अपनी जेब से खर्च भी किया और उन्होंने यह भी बताया कि एक बार उन्होंने घटनास्थल पर खून के धब्बे खुद साफ किए थे।
जानकारी के प्रबंधन और उपकरणों की समस्याएँ भी उठाई गईं। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि वे चाहते हैं कि हर पुलिस थाने को एक टैबलेट मिले। उन्होंने यह भी बताया कि कागज़ी दस्तावेज़ लेकर उन्हें स्कैन करने की प्रक्रिया में काफी कुछ छूट जाता है। चूँकि सहायता के काम का मकसद पीड़ितों की चिंता और पीड़ा कम करना है, इसलिए जानकारी और उपकरणों की कमी से मैदानी कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इसी वजह से यह मुद्दा ध्यान देने योग्य है।
हालाँकि, कॉलम के अनुसार, संशोधित आपराधिक प्रक्रिया कानून (개정 형사소송법) लागू होने के पहले दिन विशेष जांच दल में भेजे गए अभियोजकों की संबद्धता का सवाल अदालत ने उठाया, जिसके बाद ‘राष्ट्रपति के आवास के स्थानांतरण में विशेष लाभ दिए जाने के संदेह’ वाले मामले की अंतिम बहस की सुनवाई रोक दी गई। गंभीर अपराध जांच एजेंसी के पास मामलों के पंजीकरण की पावती का प्रारूप तैयार नहीं था, इसलिए उसने शिकायतकर्ताओं और अभियोग दर्ज कराने वालों को केवल ‘प्राप्त’ की मुहर लगाई। बताया गया कि अनावरण समारोह में कपड़ा हटाते ही एजेंसी का कुछ नामपट्ट दीवार से गिर गया।
तस्वीर के विवरण के अनुसार, गंभीर अपराध जांच एजेंसी ने काम शुरू करने के तुरंत बाद पहली छुट्टी के दिन कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों को काम पर बुलाकर जांच की तैयारी की। यह बात दिखाती है कि संगठन ने तैयारी शुरू कर दी थी, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि पंजीकरण के प्रारूप या संस्थाओं के बीच की प्रक्रियाएँ कब और किस हद तक दुरुस्त की गईं।
इस खबर का अर्थ
जब जांच एजेंसियों की भूमिकाएँ बदलती हैं, तो यह तय करना कि मामला कहाँ दर्ज होगा, रिकॉर्ड कैसे आगे भेजे जाएँगे और जांच तथा अभियोजन को किस प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा—मैदानी स्तर की वास्तविक चुनौतियाँ बन जाती हैं। कॉलम ने यह भी बताया कि जांच और अभियोजन के बीच समन्वय, पूरक जांच की माँग और दोबारा जांच की प्रक्रिया, तथा जांच के दायरे में आने वाले मामलों की संख्या और श्रेणियाँ बदल गई हैं। हालाँकि, केवल पहले दिन की अव्यवस्था के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि नई व्यवस्था कुल मिलाकर कैसे चलेगी। इसके बजाय, लगातार यह जाँचना चाहिए कि मैदान में जरूरी दस्तावेज़, जानकारी और संबंधित कर्मचारियों के बीच संवाद की व्यवस्था उपलब्ध है या नहीं।
इसका असर केवल जांच एजेंसियों तक सीमित नहीं रहता। किसी मामले की सूचना देने या शिकायत अथवा अभियोग दर्ज कराने वाले व्यक्ति को पंजीकरण की पुष्टि करने वाला दस्तावेज़ और आगे की प्रक्रिया के बारे में जानकारी चाहिए हो सकती है। पीड़ितों की सहायता का काम करने वाले पुलिस अधिकारी अगर समय पर मामले की जानकारी नहीं देख पाते या उन्हें सहायता के संसाधन खुद ढूँढ़ने पड़ते हैं, तो पीड़ितों तक पहुँचकर उनकी मदद करने में उन्हें अधिक समय और मेहनत लग सकती है। यह कॉलम में बताए गए मैदानी हालात से पैदा होने वाली चिंता है; इसका मतलब यह नहीं कि सुधार के बाद हर मामले में यही समस्या होगी।
उदाहरण के लिए, अगर अपराध का शिकार कोई व्यक्ति पुलिस से सहायता माँगना चाहता है, तो यह महत्वपूर्ण हो सकता है कि मामले के प्रभारी विभाग और पीड़ित सहायता अधिकारी जरूरी जानकारी साझा करें और पंजीकरण तथा सहायता की प्रक्रिया को आसान भाषा में समझाएँ। लेकिन कॉलम यह नहीं बताता कि KICS तक पहुँच के अधिकार की समस्या सुधरेगी या नहीं, और नई व्यवस्था में जानकारी साझा करने का तरीका क्या होगा।
संबंधित व्यवस्थाएँ और सहायता की जानकारी
आपराधिक न्याय व्यवस्था के संगठन में बदलाव से अलग, पीड़ितों के लिए आपराधिक मुकदमे के दौरान इस्तेमाल की जा सकने वाली प्रक्रियाएँ भी हैं। कार्यालय की कानूनी मार्गदर्शिका के अनुसार, कुछ अपराधों के प्रत्यक्ष पीड़ित इलाज के खर्च या मानसिक पीड़ा के मुआवज़े जैसे नुकसान के लिए मुआवज़े के आदेश का आवेदन कर सकते हैं। मुआवज़े का आदेश एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दोषसिद्धि के समय अदालत स्वयं आदेश दे सकती है या पीड़ित आदि के आवेदन पर फैसला कर सकती है।
आवेदन पहली या दूसरी अदालत में चल रहे मुकदमे की सुनवाई में बहस समाप्त होने से पहले उसी अदालत में करना होगा। अगर पीड़ित गवाह के रूप में अदालत में उपस्थित हुआ हो, तो वह मौखिक रूप से भी आवेदन कर सकता है। मुआवज़े का आदेश अंतिम हो जाने के बाद भी भुगतान न मिले, तो उस आदेश का उल्लेख करने वाले दोषसिद्धि के फैसले की प्रमाणित प्रति के आधार पर जबरन वसूली के लिए आवेदन किया जा सकता है। हालाँकि, मुआवज़े का आदेश हमेशा आवेदन की पूरी रकम की गारंटी नहीं देता, इसलिए अपराध के प्रकार और नुकसान के विवरण की जाँच जरूरी है।
अगर अपराध के कारण किसी की मृत्यु हो जाए या उसे कानून में निर्धारित दिव्यांगता अथवा गंभीर चोट पहुँचे, तो शर्तें पूरी होने पर राज्य से अपराध-पीड़ित सहायता अनुदान के लिए आवेदन किया जा सकता है। पारिवारिक संबंधों या पीड़ित की अपनी जिम्मेदारी से जुड़े कारणों के आधार पर भुगतान नहीं किया जा सकता या रकम कम की जा सकती है। नुकसान का मुआवज़ा या अन्य लाभ मिला हो, तो रकम में समायोजन भी हो सकता है। गवाह से पूछताछ के दौरान, शर्तें पूरी होने पर, भरोसेमंद व्यक्ति को साथ रखने, बंद कमरे में सुनवाई करने या आरोपी को अदालत से बाहर करने का अनुरोध किया जा सकता है।
जांच और मुकदमे के दौरान सबूतों को किस तरह संभाला जाता है, यह भी महत्वपूर्ण है। कार्यालय की मार्गदर्शिका बताती है कि गैरकानूनी प्रक्रिया से जुटाए गए सबूत और उन सबूतों के आधार पर मिले द्वितीयक सबूतों को सिद्धांततः दोषसिद्धि के सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, अपवाद लागू होगा या नहीं, यह गैरकानूनी कृत्य और सबूत जुटाने के बीच संबंध सहित विभिन्न परिस्थितियों को समग्र रूप से देखकर तय किया जा सकता है। किसी सबूत को स्वीकार किया जा सकता है या नहीं और केवल उसी सबूत के आधार पर दोषसिद्धि साबित होती है या नहीं—ये दो अलग सवाल हैं। यह सामान्य सिद्धांत नई व्यवस्था में ठोस प्रक्रियाएँ कैसे चलेंगी, इसकी जगह नहीं लेता।
पुष्ट तथ्य और जो अभी अज्ञात है
पुष्ट तथ्य
- कॉलम के अनुसार, देशभर में पीड़ितों के लिए नियुक्त 256 पुलिस अधिकारी हैं और उनके काम का दायरा ‘सहानुभूति→सहायता→स्थिरता’ के तीन चरणों में बताया गया था।
- कॉलम में जिन पुलिस अधिकारियों का जिक्र है, उन्होंने KICS तक पहुँच के अधिकार, सहायता बजट और उपकरणों की कमी तथा कागज़ी दस्तावेज़ स्कैन करने की प्रक्रिया में दस्तावेज़ छूट जाने की समस्या बताई।
- कॉलम के अनुसार, 2 अक्टूबर को आपराधिक न्याय व्यवस्था बदली और लागू होने के पहले दिन मुकदमे की कार्यवाही रोकने तथा मामलों के पंजीकरण की पावती का प्रारूप न होने की घटनाएँ हुईं।
- तस्वीर के विवरण में बताया गया कि गंभीर अपराध जांच एजेंसी ने काम शुरू करने के तुरंत बाद पहली छुट्टी के दिन कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों को काम पर बुलाकर जांच की तैयारी की।
जो अभी अज्ञात है
- संशोधित आपराधिक प्रक्रिया कानून लागू होने के बाद जांच और अभियोजन के बीच समन्वय तथा पूरक जांच और दोबारा जांच की प्रक्रियाएँ वास्तव में कैसे चलेंगी, इसकी ठोस जानकारी मूल लेख में नहीं है।
- यह पुष्टि नहीं हुई है कि पीड़ितों के लिए नियुक्त पुलिस अधिकारियों के KICS तक पहुँच के अधिकार और बजट तथा उपकरणों की कमी की समस्याओं को सुधारने की कोई योजना है या नहीं।
- गंभीर अपराध जांच एजेंसी के मामलों के पंजीकरण की पावती का प्रारूप कब तैयार हुआ, इसका जवाब भी मूल लेख में नहीं है।
पाठकों को क्या जाँचना चाहिए
- मामला दर्ज कराने या शिकायत अथवा अभियोग दर्ज कराने पर, पंजीकरण की पुष्टि करने वाला दस्तावेज़, प्रभारी विभाग और आगे की प्रक्रिया की जानकारी लें। केवल मूल लेख के आधार पर यह पता नहीं चलता कि पावती के प्रारूप की मौजूदा स्थिति क्या है।
- अगर अपराध के कारण इलाज के खर्च या मानसिक पीड़ा के मुआवज़े जैसे नुकसान हुए हैं, तो किसी कानूनी विशेषज्ञ या संबंधित संस्था से जाँचें कि क्या वह अपराध मुआवज़े के आदेश के दायरे में आता है और आवेदन की समय-सीमा—पहली या दूसरी अदालत में सुनवाई की बहस समाप्त होने से पहले—पूरी होती है या नहीं।
- मृत्यु, दिव्यांगता या गंभीर चोट के मामले में अपराध-पीड़ित सहायता अनुदान की शर्तें जाँचें। मुकदमे में गवाह के रूप में उपस्थित होने पर अगर सुरक्षा उपायों की जरूरत हो, तो पता करें कि किसी भरोसेमंद व्यक्ति को साथ रखने या बंद कमरे में सुनवाई का अनुरोध किया जा सकता है या नहीं।




















