संसदीय जांच से ठीक पहले आया इनकार

दक्षिण कोरिया के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जो ही-दाए ने 6 अक्टूबर को होने वाली अदालत की संसदीय जांच में आम गवाह के रूप में उपस्थित न होने का कारण-पत्र जमा किया है। यह पत्र जांच से दो दिन पहले, 4 अक्टूबर को दिया गया। संसद की विधि और न्याय समिति ने उन्हें गवाही के लिए बुलाया था।

समिति में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के उपनेता किम ई-क्योम ने बताया कि जो ने उसी दिन अनुपस्थिति का औपचारिक पत्र सौंपा। इस फैसले ने एक अहम सवाल खड़ा किया है: संसद न्यायपालिका के कामकाज की जांच किस हद तक कर सकती है, और न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा कहाँ से शुरू होती है?

जो ही-दाए का तर्क है कि संसद में गवाही देने की मांग न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान में तय शक्तियों के बंटवारे के अनुरूप नहीं है।

जो ही-दाए ने क्या कारण दिए?

जो ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायाधीशों के चयन और नामांकन से जुड़ी उनकी भूमिका संविधान से मिली स्वतंत्र शक्ति है। उनके अनुसार, इस भूमिका के बारे में संसद में उनसे जवाब मांगना संविधान के अनुच्छेद 104 के दूसरे खंड में निहित शक्तियों के पृथक्करण के उद्देश्य के विरुद्ध हो सकता है। इसका सरल अर्थ है कि सरकार, संसद और अदालतें अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र में काम करें और एक-दूसरे के फैसलों पर अनुचित दबाव न डालें।

उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सभा कानून का अनुच्छेद 121 सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर संसद में उपस्थित होकर जवाब देने की सामान्य बाध्यता नहीं लगाता। इसी आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि गवाही की मांग संसदीय जांच की सीमाओं से आगे जा सकती है।

जो ने नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक करने को भी अनुचित बताया। उनके मुताबिक, इसमें संभावित सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की निजी जानकारी और राष्ट्रपति के साथ हुई बातचीत शामिल हो सकती है, जो राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों से भी जुड़ी है।

संभावित जांच का हवाला

मुख्य न्यायाधीश ने एक और कारण दिया: न्यायाधीश-नामांकन से जुड़ी उनकी भूमिका के बारे में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है। उन्होंने कहा कि आगे जांच की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में मामले से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करना उचित न हो सकता है।

यह तर्क विवाद का हिस्सा बन गया है। एक ओर, चल रही या संभावित जांच से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने में सावधानी की जरूरत हो सकती है; दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि केवल जांच की आशंका को संसदीय निगरानी से बचने का रास्ता नहीं बनाया जाना चाहिए।


विवाद की पृष्ठभूमि: न्यायाधीश के नामांकन पर टकराव

संसदीय समिति ने 28 सितंबर को डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन से जो ही-दाए को जांच में आम गवाह के रूप में बुलाने का फैसला किया था। विवाद का केंद्र राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद के उम्मीदवार को दोबारा नामांकित करने के अनुरोध को जो द्वारा अस्वीकार करना है।

डेमोक्रेटिक पार्टी का आरोप है कि इस फैसले से लोगों के निष्पक्ष सुनवाई पाने के अधिकार पर असर पड़ा। पार्टी ने यह भी कहा है कि 3 दिसंबर को आपातकालीन सैन्य शासन के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक बुलाने समेत कुछ कदमों में संविधान या कानून का उल्लंघन हुआ हो सकता है। ये आरोप हैं; उपलब्ध खबर में इनके बारे में किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष की जानकारी नहीं दी गई है।

“जांच में बताऊँगा” कहने पर सवाल

किम ई-क्योम ने जो के अनुपस्थित रहने के फैसले की आलोचना की। उनके अनुसार, जो पहले कह चुके थे कि न्यायाधीश के उम्मीदवार को दोबारा नामांकित करने से जुड़े सवालों का जवाब वे संसदीय जांच में देंगे। इसलिए, गवाही के लिए औपचारिक बुलावा मिलने के बाद कारण-पत्र देकर न आना अपनी पिछली बात से पीछे हटने जैसा है।

किम ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 61 संसद को सरकारी कामकाज की जांच करने का अधिकार देता है। उनके मत में, संवैधानिक संस्थाओं के बीच परस्पर सम्मान का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि संसद अपने अधिकार का इस्तेमाल ही न कर सके।

डेमोक्रेटिक पार्टी की चिंता है कि यदि संभावित जांच का हवाला देकर अधिकारी संसदीय जांच से बच सकें, तो अन्य मामलों में भी यही दलील दी जा सकती है और जांच व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।

इस मामले में संसद और अदालत की भूमिकाएँ

दक्षिण कोरिया की संसद को सरकारी कामकाज की जांच करने का संवैधानिक अधिकार है। ऐसी जांचों में अधिकारी या अन्य गवाह बुलाए जा सकते हैं, ताकि सांसद फैसलों, प्रक्रियाओं और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल पूछ सकें। इसका उद्देश्य यह देखना है कि सार्वजनिक शक्तियों का उपयोग कानून और जनता के हित के अनुसार हो रहा है या नहीं।

दूसरी तरफ, न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब है कि अदालतें राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर कानून के आधार पर फैसले करें। उदाहरण के लिए, किसी न्यायाधीश की नियुक्ति या किसी मुकदमे पर फैसला राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है, लेकिन अदालत को बाहरी दबाव के बिना अपना कानूनी काम करना चाहिए। यही कारण है कि संसद की जवाबदेही संबंधी भूमिका और अदालतों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है।

इस विवाद में दोनों पक्ष अलग-अलग संवैधानिक सिद्धांतों पर जोर दे रहे हैं:

  • जो ही-दाए का पक्ष: न्यायाधीशों के नामांकन से जुड़ी भूमिका स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार है और उससे जुड़ी संवेदनशील बातचीत सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए।
  • डेमोक्रेटिक पार्टी का पक्ष: संसद को सरकारी कामकाज की जांच का अधिकार है और मुख्य न्यायाधीश को उठे सवालों का जवाब देना चाहिए।
  • व्यापक संवैधानिक प्रश्न: क्या संसदीय गवाही की मांग न्यायपालिका पर अनुचित दबाव बनेगी, या अनुपस्थिति संसद की निगरानी को सीमित करेगी?

आगे क्या देखा जाएगा?

जो के कारण-पत्र के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि समिति उनकी अनुपस्थिति को स्वीकार करेगी, फिर से बुलावा जारी करेगी या किसी अन्य संसदीय कदम पर विचार करेगी। 6 अक्टूबर की जांच में उनके बिना कार्यवाही होती है तो सांसदों के सवालों के जवाब दूसरे अधिकारियों या उपलब्ध दस्तावेजों से तलाशे जा सकते हैं।

आगे की बहस का केंद्र केवल एक गवाही नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच अधिकारों की सीमा भी होगी। यदि संसद यह मानती है कि किसी पदाधिकारी को उपस्थित होना चाहिए, तो उसे अपने अधिकार का आधार स्पष्ट करना होगा; वहीं न्यायपालिका को भी यह बताना पड़ सकता है कि स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर कौन-सी जानकारी सीमित रखी जा रही है।

इसलिए इस प्रकरण का असर मौजूदा नामांकन विवाद से आगे जा सकता है। यह तय करने में मदद मिल सकती है कि दक्षिण कोरिया में संसद की जांच-शक्ति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बीच व्यवहारिक संतुलन कैसे बनाया जाए—ताकि न तो अदालतें राजनीतिक दबाव में आएँ और न ही सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारी जवाबदेही से पूरी तरह बच सकें।